भोपाल : 23 जनवरी, 2024 (प्योरपॉलीटिक्स)
By Saket Singh Sisodia
#mp #bureaucracy मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डा मोहन यादव ने सत्ता का ताज संभालने के 40 दिन बाद पहली बार बड़े स्तर पर अधिकारियों के कामकाज में फेरबदल किए। कई दृष्टि से यह प्रशासनिक फेरबदल बेहद महत्वपूर्ण है। इसकी कई वजह भी हैं। भाजपा ने मप्र में वर्ष 2003 में सत्ता संभाली थी। उाके बाद डा मोहन यादव चौथे मुख्यमंत्री हैं। तीसरे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान लगभग सत्रह वर्ष मप्र के मुखिया रहे। इस दौरान मप्र ने विकास भी किया लेकिन सबसे बड़ा नुकसान सुशासन के क्षेत्र में हुआ। चौहान की सरकार में कुछ ब्यूरोक्रेट्स मजे में रहे, खासतौर से वे जो भ्रष्ट थे लेकिन अफसोस की बात यह रही कि जो ईमानदार अधकारी थे, वे हमेशा ही हाशिए पर रहे। हम बात करें तो एक नहीं कई अधिकारी ऐसे हैं जो प्रदेश में उपेक्षित रहे और केंद्र सरकार में उन्होंने बहुत बढ़िया काम किया। हम ओपी रावत का ही नाम ले लें तो मप्र में उन्हें मुख्यसचिव बनाने के योग्य नहीं समझा गया, जबकि केंद्र सरकार में वे कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे और सेवानिवृत्ति के बाद नरेन्द्र मोदी सरकार ने उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त भी बनाया। यह एकमात्र उदाहरण है कि मप्र में योग्य और ईमानदार अधिकारियों के लिए कितना सम्मन है। हम दूसरे अधिकारी अनुराग जैन की बात करें तो पाएंगे कि वे भी लंबे समय से केंद्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ हैं। जैन भी मप्र में मुख्यसचिव पद के दावेदार रहे हैं लेकिन उन्हें भी किसी सरकार ने तवज्जो नहीं दी। इसकी वजह भी साफ है कि भ्रष्ट ब्यूरोक्रेट्स नहीं चाहते कि ईमानदार अधिकारी को मुख्यसचिव बनाया जाए। इससे उनकी दुकानें बंद हो जाएंगी। मप्र में सीएम की कुर्सी पर मोहन यादव बैठे तो कुछ उम्मीद जगी कि ईमानदार अफसरों को महत्व मिलेगा। अब हम बात करते हैं कि मोहन सरकार ने सोमवार रात्रि को अपर मुख्यसचिव और प्रमुख सचिव स्तर के जिन अधिकारियों का तबादला किया, उनमें कुछ ईमानदार अफसरों को भी बेहतर पोस्टिंग दी है। खासतौर से उल्लेख किया जाए तो प्रमुख सचिव मनीष सिंह को वित्त विभाग की कमान देकर मोहन सरकार ने यह संदेश तो दिया है कि उनके राज में ईमानदारी और योग्यता का सम्मान है। मनीष सिंह बेहद ईमानदार और कर्मठ अधिकारी माने जाते हैं। विधानसभा चुनाव से पहले वे औद्योगिक नीति और निवेश प्रोत्साहन विभाग के प्रमुख सचिव थे। उद्योग विभाग में उन्होंने साफ-सफाई आरंभ की तो उन्हें हटा दिया गया। उनके जबह संजय शुक्ला को अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया, जो लंबे समय तक चला। विचार करना चाहिए कि सरकार ऐसे लचीले अफसरों पर क्यों मेहरबान रहती है, जो सिर्फ हां में हां मिलाना चाहते हैं। वित्त विभाग की ही बात की जाए तो यहां पदस्थ अपर मुख्यसचिव अजीत केसरी के खिलाफ रिश्वत मागने का आडियो-वीडियो लंबे समय से सोशल मीडिया में प्रचारित हो रहा है। केसरी यदि ईमानदार और निर्विवाद थे तो उन्हें इसके खिलाफ पुलिस में शिकायत करना था। यदि उन्होंने ऐसा नहीं किया तो स्वाभाविक है कि है कि दाल में कुछ न कुछ काला रहा ही होगा। दूसरी तरफ सरकार को भी चाहिए था कि इस तरह की शिकायत से राज्य सरकार की भी बदनामी हो रही थी लेकिन सरकार ने भी इसे गंंभीरता से नहीं लिया। खैर देर से ही सही, अजीत केसरी को हटाकर मोहन सरकार ने अच्छा निर्णय लिया। अब बात करते हैं कि अमित राठौर को राजस्व मंडल में क्यों भेजा गया था और अब क्यों वापस लाया गया। दरअसल, यह भी वित्त विभाग में फैले भ्रष्टाचार के रेकेट की कहानी है। राठौर इस रेकेट में शामिल नहीं हुए। बस फिर क्या था, उन्हें बाहर कर दिया गया। खैर जो भी हो लेकिन मोहन सरकार ने कई ऐसे ब्यूरोक्रेट्स को मेन स्ट्रीम में लाया है, जो लंबे समय से हाशिए में थे।



