ग्वालियर-चंबल की बिसात पर पवैया: मुख्यमंत्री के ‘अघोषित संकटमोचक’ या शक्ति संतुलन का नया केंद्र?

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भोपाल: साकेत सिंह।

मध्य प्रदेश की सियासत में ग्वालियर-चंबल अंचल हमेशा से ‘पावर सेंटर’ रहा है, लेकिन हालिया घटनाक्रमों ने यहाँ की राजनीति की दिशा बदल दी है। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का बढ़ता कुनबा और विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर के प्रभाव के बीच, भाजपा ने अपने सबसे भरोसेमंद और आक्रामक चेहरे जयभान सिंह पवैया को मुख्यधारा में वापस लाकर एक बड़ा रणनीतिक दांव खेला है। राज्यसभा की दौड़ से बाहर होने के बाद पवैया की यह सक्रियता संकेत दे रही है कि वे अब अंचल में मुख्यमंत्री मोहन यादव के ‘कान और आंख’ की भूमिका निभाएंगे।

रामनिवास रावत की विफलता और ‘ओरिजिनल’ भाजपा का उदय

कांग्रेस से भाजपा में आए रामनिवास रावत की हालिया हार ने संगठन के भीतर ‘दलबदल’ की राजनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। तोमर गुट द्वारा समर्थित इस प्रयोग के विफल होने के बाद, नेतृत्व को एक ऐसे चेहरे की तलाश थी जो कट्टर भाजपाई कैडर को एकजुट कर सके। पवैया की वापसी इस खालीपन को भरने की कोशिश है, जिससे यह संदेश गया है कि पार्टी अब अपने ‘मूल वैचारिक आधार’ की ओर लौट रही है।

सिंधिया-तोमर की ‘नूरा-कुश्ती’ के बीच तीसरा कोण

अब तक अंचल की राजनीति सिंधिया और तोमर के दो ध्रुवों के इर्द-गिर्द घूमती थी। सिंधिया के पास मंत्रियों की फौज है, तो तोमर का अपना सांगठनिक प्रभाव। ऐसे में पवैया का उभार एक ‘तीसरे शक्ति केंद्र’ के रूप में हुआ है। यह मुख्यमंत्री मोहन यादव के लिए एक मास्टरस्ट्रोक है, क्योंकि पवैया के जरिए वे अंचल की राजनीति को किसी एक गुट के हाथ में जाने से रोक सकेंगे।

प्रशासनिक गलियारों में ‘प्रॉक्सी’ की भूमिका

ग्वालियर-चंबल के प्रशासन पर अक्सर सिंधिया या तोमर समर्थकों के वर्चस्व के आरोप लगते रहे हैं। पवैया की सक्रियता से मुख्यमंत्री को एक ऐसा निष्पक्ष फीडबैक चैनल मिला है, जो बिना किसी गुटीय दबाव के सीधी रिपोर्ट दे सकेगा। पवैया अब अंचल में मुख्यमंत्री के अघोषित प्रतिनिधि के रूप में प्रशासनिक नियुक्तियों और विकास कार्यों की निगरानी कर सकते हैं, जिससे मुख्यमंत्री का नियंत्रण सीधे ग्वालियर के ‘किलों’ तक पहुँचेगा।

वैचारिक सेतु: एपीबीपी का पुराना कनेक्शन

मुख्यमंत्री मोहन यादव और जयभान सिंह पवैया, दोनों ही विद्यार्थी परिषद की पाठशाला से निकले नेता हैं। इस पुराने वैचारिक तालमेल के कारण पवैया, मुख्यमंत्री के लिए सबसे विश्वसनीय ‘संकटमोचक’ साबित हो सकते हैं। जब भी अंचल में गुटीय टकराव की स्थिति बनेगी, पवैया संगठन और सत्ता के बीच सेतु का काम करेंगे।

जयभान सिंह पवैया का राज्यसभा न जाना उनकी राजनीति का अंत नहीं, बल्कि एक नई और अधिक शक्तिशाली शुरुआत है। वे अब ग्वालियर-चंबल में भाजपा के उस ‘असंतोष’ को थामने का जरिया बनेंगे जो पिछले कुछ सालों में पैदा हुआ है। पवैया की यह दमदार वापसी बता रही है कि अंचल की सियासत में अब ‘महल’ और ‘संगठन’ के बीच संतुलन का रिमोट मुख्यमंत्री के हाथ में होगा।

 

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Saket Singh
Saket Singhhttp://purepolitics.in
MBA in Media Management from Makhanlal Chaturvedi National University of Journalism and Communication, Bhopal

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