आदिवासी वोटों की मजबूरी में विजय शाह को अभयदान

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कर्नल सोफिया कुरैशी पर विवादित टिप्पणी के बाद बढ़ा मामला, सुप्रीम कोर्ट ने दो सप्ताह में कार्रवाई आगे बढ़ाने के दिए निर्देश

भोपाल। मध्य प्रदेश की राजनीति में आदिवासी वर्ग का प्रभाव हमेशा से निर्णायक रहा है। प्रदेश में सत्ता के समीकरण साधने के लिए आदिवासी वोट बैंक बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यही कारण है कि जनजातीय कार्य विभाग के मंत्री विजय शाह से जुड़े विवाद के बावजूद सरकार और संगठन लंबे समय से उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई से बचते नजर आ रहे हैं। हालांकि अब सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख ने पूरे राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया है।

प्रदेश में अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग के लिए विधानसभा की 47 सीटें और लोकसभा की छह सीटें सुरक्षित हैं। ऐसे में आदिवासी मतदाताओं का रुझान किसी भी दल के लिए सत्ता का रास्ता तय करने में अहम भूमिका निभाता है। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में जब आदिवासी मतदाताओं का झुकाव भाजपा से हटकर कांग्रेस की ओर हुआ था, तब 15 वर्षों के बाद कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी थी। बाद में भाजपा ने आदिवासी समाज को साधने के लिए कई राजनीतिक प्रयास किए और वर्ष 2023 के चुनाव में यह वोट बैंक दोबारा भाजपा के पक्ष में लौट आया।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विजय शाह के विरुद्ध कार्रवाई को लेकर सत्ता और संगठन दोनों सतर्क हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अब राज्य सरकार को दो सप्ताह के भीतर विजय शाह के खिलाफ अभियोजन की कार्रवाई आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही उनके अन्य विवादित बयानों की भी जांच करने को कहा गया है।

दरअसल, विजय शाह ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान सेना के पराक्रम की जानकारी देश और दुनिया के सामने रखने वाली सैन्य अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी पर अमर्यादित टिप्पणी की थी। इस बयान को लेकर देशभर में विवाद खड़ा हो गया था। पार्टी के निर्देश पर विजय शाह ने माफी भी मांग ली थी, लेकिन अदालत ने इसे पर्याप्त नहीं माना।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने पूरे प्रकरण की जांच की और अगस्त 2025 में अपनी रिपोर्ट भी प्रस्तुत कर दी थी। अब अदालत के ताजा निर्देश के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या विजय शाह को एक बार फिर राजनीतिक संरक्षण मिलेगा या उनकी मंत्री पद की कुर्सी खतरे में पड़ सकती है।

विवाद की शुरुआत 11 मई 2025 को हुई थी, जब इंदौर जिले के आंबेडकर नगर क्षेत्र के रायकुंडा गांव में आयोजित एक सभा के दौरान विजय शाह ने कथित तौर पर कर्नल सोफिया कुरैशी को आतंकवादियों की बहन बता दिया था। इसके बाद यह मामला तेजी से राजनीतिक और कानूनी विवाद में बदल गया।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश पर 15 मई 2025 को इंदौर जिले के महू तहसील क्षेत्र स्थित मानपुर थाने में विजय शाह के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 के तहत भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने का आरोप लगाया गया है, जिसमें उम्रकैद या सात वर्ष तक के कारावास का प्रावधान है। इसके अलावा धारा 196(1)(ख) के तहत धर्म, जाति, भाषा या जन्मस्थान के आधार पर लोगों के बीच वैमनस्य फैलाने का आरोप भी शामिल है।

इस पूरे मामले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा बटोरी। पाकिस्तानी मीडिया ने विजय शाह के बयान को भारत के खिलाफ प्रचार का माध्यम बनाया और इसे मुस्लिम विरोधी बताने की कोशिश की। इससे देश की छवि पर भी असर पड़ने की बात कही गई।

राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि राज्य सरकार और भाजपा नेतृत्व इस मामले में कानूनी विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। संभव है कि सुप्रीम कोर्ट में यह तर्क रखा जाए कि विजय शाह का बयान मंत्री पद की जिम्मेदारियों से अलग व्यक्तिगत बयान था, इसलिए इसे अलग संदर्भ में देखा जाना चाहिए। साथ ही विजय शाह सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन भी दाखिल कर सकते हैं।

विजय शाह पिछले दो दशकों से मध्य प्रदेश की राजनीति में एक प्रभावशाली आदिवासी नेता माने जाते हैं। वर्ष 2003 के बाद से प्रदेश में बनी हर भाजपा सरकार में उन्हें मंत्री पद दिया गया है। यही कारण है कि उनके खिलाफ कार्रवाई का राजनीतिक असर भी बड़ा माना जा रहा है।

अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद राज्य सरकार क्या कदम उठाती है और क्या विजय शाह अपनी राजनीतिक स्थिति बनाए रखने में सफल हो पाते हैं।

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Saket Singh
Saket Singhhttp://purepolitics.in
MBA in Media Management from Makhanlal Chaturvedi National University of Journalism and Communication, Bhopal

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