चंदा भी नहीं देना चाहते भाजपा के सांसद- विधायक

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50 करोड़ के मुकाबले 10 करोड़ रुपये ही एकत्र कर पाया संगठन

भोपाल। आराध्य सिंह
गजब हाल हैं भाजपा सांसद और विधायक गणों के, पार्टी को चंदा भी नहीं देना चाहते हैं ।मप्र में करीब दो दशक से सत्तारूढ़ भाजपा के नेता संगठन को आर्थिक सहयोग करने में अरुचि दिखा रहे हैं। इस वजह से भाजपा का आजीवन सहयोग निधि यानी समर्पण निधि अभियान इस वर्ष लड़खड़ा गया है। इसका दूसरा बड़ा कारण नकद राशि के स्थान पर पूरी तरह डिजिटल या आनलाइन भुगतान अनिवार्य करना बताया जा रहा है।

जनसंघ के समय से चले आ रहे इस अभियान की शुरुआत स्व. कुशाभाऊ ठाकरे ने की थी। इसे प्रतिवर्ष पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पुण्यतिथि (11 फरवरी) के अवसर पर शुरू किया जाता है। लगभग एक महीने बाद अब तक इस अभियान में मात्र 10 करोड़ की राशि एकत्र हो पाई है। पार्टी ने समर्पण राशि का कोई लक्ष्य तो निर्धारित नहीं किया था लेकिन संगठन को इस वर्ष 50 करोड़ से अधिक राशि एकत्र होने की आशा थी।

28 फरवरी को समाप्त होने वाले इस अभियान को पार्टी ने 15 मार्च तक आगे भी बढ़ाया है। गौरतलब है कि पहले स्वेच्छा से विधायक- सांसद अपने एक माह का वेतन समर्पण निधि में दिया करते थे। वर्ष 2025 में 25 करोड़ रुपये एकत्र हुए थे।

समर्पण अभियान में पार्टी ने इस वर्ष दो बड़े परिवर्तन किए हैं। एक तो यह कि सहयोग निधि सिर्फ डिजिटल माध्यम से ही ली जा रही है, जिससे पारदर्शिता बनी रहे और कोई प्रश्न नहीं उठा पाए। दूसरा यह कि 20 हजार रुपये से अधिक सहयोग निधि देने वालों का पैन नंबर भी लिया जाएगा।

अभियान में कई जिले लक्ष्य से बहुत पीछे हैं। मुरैना जिले के दक्षिण मंडल और जौरा ने अपना शत-प्रतिशत लक्ष्य समय से पूर्व ही पूरा कर लिया है। इंदौर जैसे बड़े शहरों में उद्योगपतियों और प्रबुद्धजनों का बड़ा सहयोग मिल रहा है। उद्योगपति विनोद अग्रवाल ने एक करोड़ रुपये का चेक पार्टी को सौंपा है।

पार्टी का लक्ष्य इस निधि के माध्यम से संगठन को आगामी चुनावों और भविष्य की गतिविधियों के लिए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है। भारतीय जनता पार्टी के आजीवन सहयोग निधि (समर्पण निधि) के तहत एकत्रित की गई राशि का बंटवारा संगठन के विभिन्न स्तरों पर इसके संचालन और मजबूती के लिए किया जाता है।

  • राष्ट्रीय स्तर: कुल एकत्रित राशि का एक निश्चित हिस्सा राष्ट्रीय संगठन को भेजा जाता है।

  • राज्य स्तर: एक बड़ा हिस्सा राज्य इकाई के पास रहता है। इसका उपयोग राज्य स्तरीय कार्यालयों के संचालन, चुनाव प्रबंधन और प्रदेश स्तर के कार्यक्रमों के लिए किया जाता है।

  • स्थानीय स्तर: शेष राशि जिलों और स्थानीय मंडलों के पास रहती है ताकि वे अपने स्तर पर संगठन की गतिविधियों और कार्यालय के दैनिक खर्चों को पूरा कर सकें।

पार्टी नेताओं के अनुसार एकत्रित और वितरित की गई राशि का विधिवत ऑडिट किया जाता है और इसकी जानकारी आयकर विभाग को दी जाती है।


अभियान प्रभारी का पक्ष

“राजनीति में शूचिता के साथ संगठन चलाने के लिए यह परंपरा भाजपा के पितृ पुरूष कुशाभाऊ ठाकरे ने शुरु की थी। देश के कई राज्यों में समर्पण अभियान समाप्त कर दिया गया है, अभी मप्र में चालू है। यहां भी लंबे समय तक नहीं चलाया जा सकता है। आडिट के कारण केवल आनलाइन ले रहे हैं। विधायक- सांसदों पर भी काई जोर- जबर्दस्ती नहीं है, जो स्वेच्छा से दे, वही हमें स्वीकार है। 15 मार्च के बाद प्रदेश के सभी हिस्सों से राशि एकत्रीकरण की जानकारी आएगी, तब पता चलेगा कि कितना पैसा आया।”

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