7 नवंबर प्योरपॉलिटिक्स
भोपाल। मुद्दे, चेहरे और दायरा अलग हैं, तो वोट शेयर में अंतर लाजमी है, लेकिन भाजपा लोकसभा और विधानसभा चुनावों के 12 प्रतिशत का अंतर दूर करने की वजहें तलाश रही है। भाजपा को 2019 के लोकसभा चुनाव में 52 प्रतिशत 2018 के विधानसभा चुनाव में 40 प्रतिशत वोट मिले थे। 230 सदस्यों वाली विधानसभा में भाजपा को 109 सीट ही मिली थी, तो प्रदेश की 29 लोकसभा सीटों में भाजपा की झोली में 28 सीटें आईं थीं।
दरअसल, लोकसभा चुनाव में भाजपा को केंद्र सरकार की गरीब कल्याण की योजनाओं, मोदी फैक्टर और केंद्रीय नेताओं की छवि का लाभ मिल जाता है, जबकि विधानसभा चुनाव में डबल इंजन सरकार, शिवराज फैक्टर और गरीब कल्याण की योजनाओं का असर होता है, लेकिन विधायक और स्थानीय नेताओं को लेकर एंटी इनकंबेंसी से वोट शेयर पर काफी असर पड़ता है। साथ ही मुद्दे भी राष्ट्रीय स्तर से सिमट कर स्थानीय स्तर पर उठते हैं।
भाजपा उन विस सीटों के आंकड़े खंगाल रही है, जहां वोट शेयर में बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है। पार्टी ऐसी सीटों पर जातिगत समीकरण, स्थानीय मुद्दे और नेताओं के संदर्भ में जानकारी जुटा रही है, साथ ही वोट शेयर बढ़ाने के लिए कवायद शुरू करने की तैयारी में है। 2018 के विस चुनाव में कैबिनेट के कई मंत्रियों को अपनी सीट गंवानी पड़ी थी। हार के बाद मंथन में यह भी सामने आया था कि संगठन को जमीनी हकीकत टटोलने में भी कई सीटों पर पर्याप्त अंदाजा नहीं लग सका था।
फिलहाल भाजपा वोट शेयर बढ़ाने के लिए डबल इंजन सरकार के फार्मूले पर सबसे ज्यादा निर्भर दिखाई दे रही है। केंद्र की कई योजनाओं को मध्यप्रदेश में हितग्राही के लिए अधिक फायदेमंद बनाने के साथ ऐसी योजनाएं भी शुरू की गई हैं, जिसे भाजपा की सरकार होने पर ही जारी रखने की सूरत बनती हो। जैसे प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि में केंद्र के 6000 रुपए में प्रदेश सरकार 4000 रुपए जोड़ती है। गरीबों के लिए आवास योजना में भी केंद्र सरकार के साथ प्रदेश सरकार बड़ी राशि खर्च कर गरीबों को मकान दे रही है। महिलाओं और बेटियों के कल्याण की योजनाओं में भी केंद्र के साथ मध्यप्रदेश बड़ी भागीदारी कर रहा है।



