भोपाल : 6 दिसंबर , 2023 (प्योरपॉलीटिक्स)
मालवंचल में बढ़ी भाजपा की 20 सीटें, आदिवासी सीटों में चार की वृद्धि
जयस का प्रभाव बरकरार, 2018 में भाजपा के पास आदिवासी वर्ग की 18 सीटें थी और अब नौ सीट मिली हैं
भारतीय जनता पार्टी ने आदिवासी वर्ग को साधने के लिए क्या-क्या जतन नहीं किए लेकिन आदिवासी हैं कि टस से मस नहीं हुए। गौरव दिवस मनाया। द्रौपदी मुर्मु को राष्ट्रपति बनाया। पेसा नियम बनाए। शंकर शाह-रघुनाथ शाह के बलिदान स्थल पर स्मारक बनवाए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शहडोल जाकर आदिवासी भाई-बहनों के साथ संवाद किया, फिर भी इस वर्ग ने कांग्रेस को ही वोट किया। भाजपा भले ही सरकार में आ गई हो लेकिन उसे लोकसभा चुनाव के लिए इसे खतरे की घंटी मानना चाहिए क्योंकि मप्र में छह सीटें आरक्षित हैं। यदि समय रहते ध्यान नहीं दिया तो भाजपा के मिशन 29 का लक्ष्य फिसल सकता है।
भाजपा को भले ही मध्य प्रदेश में प्रचंड जीत मिली हो लेकिन आदिवासी अंचल में उसके सामने खतरा बरकरार है। लोकसभा चुनाव को सेमीफाइनल मानकर भाजपा ने चुनाव लड़ा और मालवांचल में पिछली बार पराजय की भरपाई करते हुए 20 सीटें अधिक जीतीं।
66 सीटों वाले मालवा अंचल में भाजपा ने 47 सीट जीती हैं। इस अंचल में आदिवासी वर्ग के लिए सुरक्षित 22 सीटें हैं, जिनमें पिछले चुनाव में भाजपा को मात्र पांच सीटें ही मिली थीं। इस बार चार का इजाफा कर भाजपा को नौ सीटें मिली हैं। कांग्रेस को 12 और भारत आदिवासी पार्टी को एक सीट मिली है। इसका आशय यह हुआ कि मालवांचल में भाजपा के अब तक के प्रयास के बाद भी जय युवा आदिवासी शक्ति संगठन (जयस) का प्रभाव बरकरार है। इससे भाजपा मालवंचल में दस वर्ष पुराने अपने रिकार्ड को हासिल नहीं कर पाई। 2018 में भाजपा में आदिवासी वर्ग की 16 सीटें थी।
भारतीय जनता पार्टी ने अब तक उन विधानसभा क्षेत्रों की समीक्षा नहीं की, जहां उसे पराजय मिली है लेकिन मालवांचल में जो कारण सामने आ रहे हैं उनमें सबसे बड़ा कारण मालवा में जयस को माना जा रहा है। पार्टी नेताओं का कहना है कि जयस के प्रभाव को कम करने के लिए भाजपा ने प्रयास तो बहुत किए लेकिन परिणाम जयस और कांग्रेस के पक्ष में ही रहे।
वर्ष कुल सीट भाजपा कांग्रेस अन्य
2003 (41) 34 2 5
2008 (47) 29 17 1
2013 (47) 31 15 1
2018 (47) 16 30 1
2023 (47) 24 22 1
मालवांचल कांग्रेस भाजपा
22 (2023) 12 9 1
22 (2018 ) 16 6
22 (2013) 4 18
मालवांचल में 13 आदिवासी सीटों पर भाजपा हारी
कहा जाता है कि भाजपा के मालवांचल ही सत्ता की चाबी है। यहां भाजपा ने 2023 के चुनाव में अच्छी सफलता पाई लेकिन आदिवासी सीटों पर उसके सारे प्रयास फेल हो गए। भाजपा दावा करती रही कि पेसा नियम लागू करने के बाद से जयस का प्रभाव कम हो गया है लेकिन परिणाम वहीं 2018 के चुनाव से मिलते जुलते ही रहे। कांग्रेस को 12 सीटें मिली तो भाजपा को मात्र नौ सीटों पर समेट दिया गया। एक अन्य के खाते में गई। पार्टी नेताओं की मानें तो इस नुकसान की वजह जयस भी है। जयस पहले सामाजिक संगठन के रूप में काम किया करता था । लेकिन पिछले चुनाव में जयस के संरक्षक डा हीरालाल अलावा ने कांग्रेस में शामिल होकर मनावर सीट से चुनाव लड़ा और जीता,इस बार भी अलावा कड़ी टक्कर देकर जीत गए। इसका नुकसान ये हुआ कि जहां जहां जयस का प्रभाव था ,वहां भाजपा को कम वोट मिले ।
आदिवासी वोटबैंक ही बदलता है सरकार- आदिवासी वोटबैंक जब जब करवट लेता है तब तब सरकार में परिवर्तन होता है। संयुक्त मध्यप्रदेश के दौर में भी 1990 में भाजपा की सरकार सिर्फ आदिवासी सीटों के भरोसे बनी थी। 1993 और 1998 में जब यही वोटबैंक कांग्रेस में चला गया तो कांग्रेस की सरकार बनी। 2003 के चुनाव में अदिवासी भाजपा के साथ आए। तब प्रदेश में आदिवासी सीटों की संख्या 41 थी, जिसमें भाजपा को 34 और कांग्रेस को सिर्फ दो सीट मिली थी ।



