आईबीसी (IBC) के 10 साल: दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता ने कैसे बदल दी भारत के कॉरपोरेट सेक्टर की तस्वीर?
नई दिल्ली; 16 जून, 2026: भारत के वित्तीय और कॉरपोरेट इतिहास में गेमचेंजर साबित हुई दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) ने अपने सफल 10 वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस ऐतिहासिक अवसर पर कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय के अधीन ‘भारतीय कॉरपोरेट मामले संस्थान’ (IICA) ने नई दिल्ली के प्रधानमंत्री संग्रहालय सभागार में एक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया। “भारत के पुनर्गठन पारितंत्र को पुनर्परिभाषित करने” के विषय पर केंद्रित इस सम्मेलन में देश के शीर्ष न्यायिक अधिकारियों, नीति निर्माताओं और विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। इसी मंच से पोस्ट ग्रेजुएट इंसॉल्वेंसी प्रोग्राम (PGIP) के छठे बैच के 40 नए दिवालियापन पेशेवरों (Insolvency Professionals) का दीक्षांत समारोह भी संपन्न हुआ।
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रिकॉर्ड वसूली: IBC समाधान प्रक्रियाओं के जरिए अब तक लगभग ₹4 लाख करोड़ की ऐतिहासिक वसूली की जा चुकी है।
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₹14 लाख करोड़ सुरक्षित: ट्रिब्यूनल की औपचारिक मंजूरी से पहले ही 32,000 मामलों का निपटारा कर करीब ₹14 लाख करोड़ के ऋण डूबने से बचाए गए।
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लेनदारों को फायदा: इस संहिता के तहत लेनदारों को परिसमापन मूल्य (Liquidation Value) का लगभग 170 प्रतिशत प्राप्त हुआ है।
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छात्रों को सौगात: PGIP छात्रों के लिए ‘पीएम विद्या लक्ष्मी’ छात्रवृत्ति और ‘वन नेशन वन सब्सक्रिप्शन’ (ONOS) सुविधा की घोषणा की गई।
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भविष्य की तैयारी: सीमा पार दिवालियापन (Cross-border insolvency) और AI-आधारित अर्ली वार्निंग सिस्टम पर नई रणनीति तैयार करने पर जोर दिया गया।
₹14 लाख करोड़ की सुरक्षा: आईबीसी का परिवर्तनकारी प्रभाव
सम्मेलन को संबोधित करते हुए कॉरपोरेट कार्य सचिव, श्रीमती दीप्ति गौर मुखर्जी ने IBC को भारत के वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र की ‘व्यवहारिक क्रांति’ करार दिया। आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि IBC के लागू होने से न केवल व्यापारिक विवादों का समयबद्ध निपटारा हुआ है, बल्कि ₹14 लाख करोड़ की भारी-भरकम राशि के ऋण भी सुरक्षित किए गए हैं।
राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अशोक भूषण ने इस अवसर पर कहा कि 2016 से 2021 का दौर IBC की स्थापना का युग था, जबकि वर्तमान दौर इसके परिष्करण का है। उन्होंने नवनिर्मित दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2026 को भारत के न्यायिक मार्गदर्शन और व्यावहारिक अनुभव की परिपक्वता का प्रतीक बताया। वहीं, NCLT के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अनुपिंदर सिंह ग्रेवाल ने ‘सीमा पार दिवालियापन’ पर संयुक्त राष्ट्र (UNCITRAL) मॉडल कानून अपनाने की वकालत की।
नए टैलेंट को मिला सम्मान और ‘पीएम विद्या लक्ष्मी’ का साथ
इस भव्य आयोजन में IICA के महानिदेशक श्री ज्ञानेश्वर कुमार सिंह ने बताया कि संस्थान का PGIP कोर्स देश में उच्च कुशल दिवालियापन पेशेवरों का कैडर तैयार कर रहा है। छठे बैच के 40 छात्रों को डिग्री दी गई।
अकादमिक उत्कृष्टता के लिए आशीष कुमार को प्रथम (₹50,000), अरुण कुमार को द्वितीय (₹30,000) और के. गीता वैष्णवी को तृतीय (₹20,000) पुरस्कार से सम्मानित किया गया। ये पुरस्कार प्रतिष्ठित फर्म ‘एजेडबी एंड पार्टनर्स’ द्वारा प्रायोजित थे। प्रतिभाओं को आर्थिक बाधाओं से मुक्त रखने के लिए छात्रों हेतु ‘पीएम विद्या लक्ष्मी योग्यता-सह-साधन छात्रवृत्ति’ का ऐलान इस आयोजन की बड़ी उपलब्धि रही।
भविष्य की रणनीति: AI और डिजिटल सशक्तिकरण पर जोर
सम्मेलन के दूसरे सत्र में चार महत्वपूर्ण पैनल चर्चाएं हुईं। इनमें मुख्य रूप से लेनदार-प्रेरित दिवालियापन समाधान प्रक्रिया (CIIRP), संकटग्रस्त संपत्तियों के द्वितीयक बाजार (ARCs और AIFs की भूमिका) और प्रौद्योगिकी-संचालित सुधारों पर मंथन किया गया। विशेषज्ञों ने माना कि भारत की दिवालियापन प्रणाली को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और एकीकृत डिजिटल प्लेटफार्मों का उपयोग अब अनिवार्य हो गया है।
निष्कर्ष
दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) के एक दशक की यह यात्रा स्पष्ट करती है कि भारत अब वैश्विक स्तर पर एक भरोसेमंद ‘पुनर्गठन गंतव्य’ (Restructuring Destination) बन चुका है। IICA का यह सम्मेलन न केवल पिछले 10 सालों की सफलताओं का जश्न है, बल्कि ‘विकसित भारत’ के उस संकल्प की नींव भी है जहां पारदर्शी कॉरपोरेट कानून आर्थिक विकास और विदेशी निवेशकों के भरोसे को नई ऊंचाइयां देंगे।



