नई दिल्ली: प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय लोकतांत्रिक ढांचे में महिलाओं की भागीदारी को लेकर एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण साझा किया है। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि विधायी संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण न केवल आवश्यक है, बल्कि यह हमारे लोकतंत्र को और अधिक जीवंत और सहभागी बनाने के लिए “समय की मांग” है।
देरी पर जताई चिंता
हाल ही में प्रकाशित एक विशेष ओप-एड (Op-ed) आलेख के माध्यम से प्रधानमंत्री ने इस विषय पर अपने विस्तृत विचार जनता के सामने रखे। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस ऐतिहासिक सुधार को लागू करने में किसी भी प्रकार का विलंब देश के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण होगा।
प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर अपनी भावनाओं को साझा करते हुए लिखा:
“महिलाओं के लिए विधायी संस्थाओं में आरक्षण समय की मांग है! इससे हमारा लोकतंत्र और अधिक जीवंत एवं सहभागी बनेगा। इस आरक्षण को लागू करने में किसी भी तरह की देरी अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण होगी। इसी को लेकर मैंने अपने विचार इस आलेख में साझा किए हैं।”
लोकतंत्र को मिलेगी नई ऊर्जा
प्रधानमंत्री का मानना है कि जब नीति निर्धारण और कानून बनाने की प्रक्रियाओं में महिलाओं की सक्रिय और आरक्षित भागीदारी होगी, तो शासन प्रणाली अधिक समावेशी और संवेदनशील बनेगी। यह कदम केवल प्रतिनिधित्व के बारे में नहीं है, बल्कि देश के विकास में ‘नारी शक्ति’ को निर्णायक भूमिका देने के बारे में है।
सरकार के इस रुख से यह संकेत मिलता है कि आने वाले समय में विधायी निकायों में महिलाओं की उपस्थिति को लेकर बड़े संवैधानिक और प्रशासनिक बदलावों को प्राथमिकता दी जा सकती है।



