सिंधिया- दिग्विजय के बीच पीढ़ियों से जारी है जंग, चुन-चुन कर ले रहे बदला

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भोपाल : 5 दिसंबर , 2023 (प्योरपॉलीटिक्स)

मोदी सरकार के विमानन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के बीच तकरार कोई नई बात नहीं है। दोनों के बीच पीढ़ियों से चली रंजिश चली आ रही है। अब यही तकरार राजा- महाराजा के बीच नए सियासी मोड़ पर पहुंच गई। सिंधिया ऐसे नेता हैं जिन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बाद सर्वाधिक 80 सभाएं की। दिग्विजय के करीबियों को हराने के लिए सिंधिया ने भी अपनी ताकत फूंकी। भाई लक्ष्मण सिंह, केपी सिंह, नेता प्रतिपक्ष रहे डा गोविंद सिंह हों या प्रियव्रत सिंह, सभी को हार का सामना करना पड़ा। जीतू पटवारी, कुणाल चौधरी, प्रवीण पाठक, लाखन सिंह, घनश्याम सिंह को पराजय का सामना करने से भी दिग्विजय की ताकत कम हुई। सिंधिया ने पिछोर विधानसभा सीट पर केपी समर्थक अरविंद लोधी को जिला बनाने की घोषणा भी सीएम से कराई और जीत ली।

ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में जाने के बाद से पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अपने बेटे जयवर्द्धन के लिए ग्वालियर-चंबल अंचल में राजनीतिक जमीन तैयार करने में जुट गए थे। इस विधानसभा चुनाव को वह जयवर्द्धन को एक क्षत्रप के रूप में प्रोजेक्ट करने का अच्छा मौका मान रहे थे। चुनाव परिणामों में हुई 10 सीटों के नुकसान से साफ हो गया है कि दिग्विजय सिंह को इस अंचल से निराशा ही मिली है। अंचल की 34 सीटों में से आठ सीटों को छोड़ दें तो टिकट देने में दिग्विजय सिंह की अहम भूमिका थी।

ग्वालियर-चंबल में कांग्रेस को 2018 के विधानसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया के चेहरा सामने होने का लाभ मिला था। कांग्रेस अंचल की 34 सीटों में से 26 सीटों पर कब्जा करने में कामयाब हुई थी। सरकार बनने के बाद कांग्रेस ने सिंधिया के चेहरे पर मिली सफलता को पूरी तरह से नकार दिया था। इस बार कांग्रेस को यहां 10 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा। यही नहीं दिग्विजय के समर्थक नेता प्रतिपक्ष गोविंद सिंह, केपी सिंह और लाखन सिंह चुनाव हार गए। दिग्विजय के भाई लक्ष्मण सिंह भी चुनाव हार गए।

दिग्विजय के बेटे जयवर्धन स्वयं बमुश्किल चुनाव जीत पाए। दिग्विजय सिंह के प्रभाव वाले गुना, अशोकनगर और शिवपुरी जिलों की 12 सीटों में से भाजपा को आठ सीटों पर सफलता मिली है। अंचल में पार्टी की करारी हार के पीछे की सबसे बड़ी वजह यह रही कि पौने चार साल में पार्टी यहां से ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसा कद्दावर नेता नहीं खड़ा कर पाई, जो उनका विकल्प बन सके। इसके अलावा सिंधिया के भाजपा में जाने के बाद प्रदेश स्तर की पहली और दूसरी पंक्ति में ऐसा कोई चेहरा कांग्रेस के पास नही है, जो कि कांग्रेस में सर्वमान्य हो। बात नेता प्रतिपक्ष डा गोविंद सिंह की करें तो अब उनकी उम्र दौड़भाग कर पाने की नहीं है।

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